Released in 1986, Jaanbaaz remains one of the most stylish and ambitious films of 1980s Hindi cinema. Produced and directed by Feroz Khan, the film blended family drama, romance, action, and crime within a visually lavis...
View on Facebookजहाज के मालिक ने जिस नन्हें बच्चे को तूफ़ानी रात में एक छोटी सी किश्ती में बहते हुए पाया था, उसी चन्दर ने जवान होकर एक खौफ़नाक तूफ़ान के वक़्त अपनी जान जोखिम में डालकर उस जहाज़ को डूबने से बचा लिया।
मालिक ने ख़ुश होकर दस हज़ार अशर्फि़याँ दीं। चन्दर के दिल में एक ही तमन्ना थी कि वह अपनी यतीम बहन की शादी किसी अच्छे घर में कर दे। परन्तु उनकी जाति, कुल और माँ-बाप का किसी को पता न होने के कारण उसे बहन के लिए वर ढूँढने में बहुत मुश्किल पेश आईं, मगर अन्त में वह कामयाब हो गया। लेकिन इससे पहले कि वह अपने जीवन की पहली खुशी देख सकता, वहाँ के सेनापति की नज़र उसकी बहन सावित्री पर पड़ गई। सावित्री ने अपनी इज्ज़त नहीं दी, जान दे दी।
बहन की चिता पर चन्दर ने उसका बदला लेने की क़सम खाई और उसी रात वह सेनापति के महल में पहुँच गया मगर पहरेदारों ने ठीक समय पर पहुँच कर सेनापति को मौत से बचा लिया और चन्दर को समुन्दर पार के क़िले में क़ैद कर दिया गया। वहाँ एक पगली औरत से मुलाक़ात होने पर उसे पता चला कि वह पगली असल में उसकी माँ थी और कि वह यतीम नहीं बल्कि इस देश के महामंत्री सरदार मंगलसेन का पुत्र है। माँ ने उसे बताया कि किस तरह बारह साल पहले इसी सेनापति ने महाराज की हत्या कर दी थी और किस तरह उसके पिता राजकुमार और राजकुमारी को बचाकर ले गये थे।
क़ैद से निकलने के लिए चन्दर और उसकी माँ ने एक सुरंग खोदना शुरू किया परन्तु कारागार की दीवार टूटने से पहले ही उसकी माँ संसार के सारे बन्धनों से आज़ाद हो गई। माँ की मृत्यु के बाद चन्दर पहरेदारों से लड़ता-लड़ाता क़िले की दीवार से समुन्दर में कूद गया। एक दिन और एक रात तैरते रहने के बाद एक विदेशी जहाज वालों ने उसे बचा लिया और उसे अपना गुलाम बनाकर उसके पाँव में ज़ंजीरें डाल दीं। उनके द्वीप पर पहुँचते ही एक लड़की से चन्दर की झड़प हो गई। वह थी मन्दाकिनी, वहाँ की शाहज़ादी जो पहली झड़प में ही दिल हार बैठी मगर उसकी सारी कोशिशें चन्दर के दिल में दहकती हुई बदले की आग को ठण्डा न कर सकी। अन्त में उसने बहुत सी दौलत और एक किश्ती देकर चन्दर को इस वादे पे भेज दिया कि वह सेनापति से बदला लेकर एक महीने के अन्दर अन्दर वापस आ जायगा।
अपने देश में पहुँचने पर सबसे पहले चन्दर की मुलाकात बंजारों के एक डेरे में राजकुमारी पद्मा से हुई, जो उसकी वीरता देखकर उस पर मोहित हो गई। आगे चल कर पता चला कि उसके पिता महामंत्री गिरफ़्तार हो गये हैं।
चन्दर भेस बदल कर सेनापति और रानी से मिला और उन्हें बुद्ध बनाकर उस ख़ूनी किले का पता लगाया जहाँ उसके पिता दूसरे दिन मगरमच्छों से भरे हुये कुएं में फेंके जाने वाले थे।
चन्दर ने किस तरह अपने पिता को बचाया, दिल की तड़प से मजबूर मन्दाकिनी ने एक महीना बीत जाने पर क्या किया। राजकुमार और राजकुमारी को उनका सच्चा हक़ कैसे दिलाया गया और चन्दर ने बहन की चिता पर जो क़स्म खाई थी उसे किस तरह पूरा किया यह आप "राजतिलक" में देखिये।
(From the official press booklet)